05 April 2017

जाओ और आओ (Hindi Story)



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!! जाओ और आओ  !!





एक गाँव में एक धनी मनुष्य रहता था | उसका नाम भैरोमल था | भैरोमल के पास बहुत सारे खेत थे | वह बहुत सुस्त और आलसी था | वह हमेशा अपने मजदुर और नौकरों को भेजकर ही अपना सारा काम कराता था |

मजदूर और नौकर मनमाना काम करते थे | वे लोग खेत पे तो थोड़ी देर काम करते थे , बाकी घर बैठे रहते थे , इधर-उधर घूमते या गप्पे उड़ाया करते थे | खेत न तो ठीक से जोते जाते थे , न सींच जाते थे और न उनमें ठीक खाद ही पड़ती थी | खेतों में बीज भी ठीक से नहीं पड़ते थे और उनकी घास तो कोई निकालता ही नहीं था | इसका फल यह हुआ कि खेत में उपज धीरे-धीरे घटने लगी | थोड़े ही दिनों में भैरोमल गरीब होने लगा |




उसी गाँव में राम प्रसाद नामक एक दूसरा किसान था | उसके पास खेत नहीं थे | वह भैरोमल के ही कुछ खेत लेकर खेती करता था ; किन्तु वह था बहुत परिश्रमी | अपने मजदूरों के साथ वह खेत पर जाता था , डटकर परिश्रम करता था | उसके खेत भले प्रकार से जोते और सींचे जाते थे | अच्छी खाद पड़ती थी | घास निकाली जाती थी और बीज भी समय पर बोये जाते थे | उसके घर के लोग भी खेत पर काम करते थे | उसके खेत में उपज अच्छी होती थी | लगान देकर और खर्च करके भी वह बहुत-सा अन्न बचा लेता था | और इस तरह अपनी मेहनत और सूझ-बुझ से थोड़े ही दिनों में राम प्रसाद धनी हो गया |




कुछ दिनों बाद जब भैरोमल बहुत गरीब हो गया , उसके ऊपर महाजनों का ऋण हो गया तो उसे अपने खेत बेचने की आवश्यकता जान पड़ी | यह समाचार पाकर रामप्रसाद उसके पास आया और बोला - मैंने सुना है कि आप अपने खेत बेचना चाहते  है | कृपा करके आप मेरे हाथ अपने खेत बेचें | मैं दूसरों से कम मूल्य नहीं दूंगा |

भैरोमल ने आश्चर्य से पूछा- "भाई रामप्रसाद मेरे पास इतने खेत थे , फिर भी मैं ॠणी हो गया हूँ , किन्तु तुम्हारे पास इतना धन कहाँ से आ गया है ?" तुम तो मेरे ही थोड़े-से खेत लेकर खेती करते हो | उन खेतों की लगान भी तुम्हें देनी पड़ती है और घर का भी काम चलाना पड़ता है | मेरे खेत खरीदने के लिए तुम्हें रूपये किसने दिए ?

राम प्रसाद ने कहा - "मुझे रूपये किसी ने नहीं दिया | रूपये तो मैंने खेतों की उपज से ही बचकर इकठ्ठे किये है | आपकी खेती और मेरी खेती में एक अंतर है | आप नौकरों-मजदूरों आदि सबसे काम करने के लिए "जाओ-जाओ कहते है , इससे आपकी संपत्ति भी चली गयी | मैं अपने मजदूरों और नौकरों से पहले काम करने को तैयार होकर उन्हें अपने साथ काम करने के लिए सदा आओ-आओ कहकर बुलाता हूँ | इससे मरे यहाँ संपत्ति आती है |

अब भैरोमल राम प्रसाद की बात समझ गया था | उसने थोड़े-से खेत रामप्रसाद के हाथ बेचकर अपना ऋण चूका दिया और बाकी खेतों में परिश्रमपूर्वक खेती करने लगा | थोड़े ही दिनों में उसकी दशा सुधर गयी | वह फिर सुखी और संपन्न हो गया |


Moral - दूसरों के ऊपर हमारी निर्भरता हमें कभी भी सफलता नहीं दिला सकती बल्कि इसके लिए तो हमें स्वयं ही परिश्रम करना पड़ेगा |




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4 comments:

  1. बहुत ही सही शिक्षा दी है इस कहानी ने- "दूसरों के ऊपर हमारी निर्भरता हमें कभी भी सफलता नहीं दिला सकती बल्कि इसके लिए तो हमें स्वयं ही परिश्रम करना पड़ेगा".

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  2. bahut badhiya lekh h sir apka lekh mene achhikhabar par padha or apke blog par dekha vakai kafi achhe article ka collection h apke pas

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