24 April 2017

हम सब सुमन एक उपवन के (Hindi Poem)

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हम सब सुमन एक उपवन के (Hindi Poem)

!! हम सब सुमन एक उपवन के !!


एक हमारी धरती सबकी जिसकी मिट्टी से जन्में हम
मिली एक ही धुप हमें है सींचे गए एक जल से हम
पले हुए है झूल-झूल कर पलनों में हम एक पवन के
हम सब सुमन एक उपवन के 


रंग-रंग के रूप हमारे अलग-अलग है क्यारी-क्यारी
लेकिन हम सब से मिलकर ही इस उपवन की शोभा सारी
एक हमारा माली हम सब रहते नीचे एक गगन के
हम सब सुमन एक उपवन के 


सूरज एक हमारा , जिसकी किरणें उसकी कली खिलाती
एक हमारा चाँद , चाँदनी जिसकी हम सब को नहलाती
मिले एक से स्वर हमको है भ्रमरों के मीठे गुंजन से
हम सब सुमन एक उपवन के 


काँटों-से मिल कर हम सब ने हँस-हँस कर है जीना सीखा
एक सूत्र में बंधकर हमने हार गले का बनना सीखा
सबके लिए सुगंध हमारी हम श्रृंगार धनी-निर्धन के
हम सब सुमन एक उपवन के ||


द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी





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Note :- This inspirational poem is not my original creation .


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जो बीत गई सो बात गई (Hindi Poem)

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जो बीत गई सो बात गई (Hindi Poem)

!! जो बीत गई सो बात गई !!


जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वो डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इस के प्यारे छूटे
जो छुट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई 


जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सुख गया तो सुख गया
मधुवन की छाती को देखो
सुखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाई कितनी बल्लरियाँ
जो मुरझाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई


जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन-मन दे डाला था
वो टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते है
गिर मिटटी में मिल जाते है
जो गिरते है कब उठते है
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई


मृदु मिटटी के बने हुए
मधु घट फूटा ही करते है
लघु जीवन लेकर आये है
प्याले टुटा ही करते है
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट है मधु प्याले है
जो मादकता के मारे है
वो मधु लुटा ही करते है
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घाट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई ||


- हरिवंश रॉय बच्चन





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05 April 2017

जाओ और आओ (Hindi Story)



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!! जाओ और आओ  !!





एक गाँव में एक धनी मनुष्य रहता था | उसका नाम भैरोमल था | भैरोमल के पास बहुत सारे खेत थे | वह बहुत सुस्त और आलसी था | वह हमेशा अपने मजदुर और नौकरों को भेजकर ही अपना सारा काम कराता था |

मजदूर और नौकर मनमाना काम करते थे | वे लोग खेत पे तो थोड़ी देर काम करते थे , बाकी घर बैठे रहते थे , इधर-उधर घूमते या गप्पे उड़ाया करते थे | खेत न तो ठीक से जोते जाते थे , न सींच जाते थे और न उनमें ठीक खाद ही पड़ती थी | खेतों में बीज भी ठीक से नहीं पड़ते थे और उनकी घास तो कोई निकालता ही नहीं था | इसका फल यह हुआ कि खेत में उपज धीरे-धीरे घटने लगी | थोड़े ही दिनों में भैरोमल गरीब होने लगा |




उसी गाँव में राम प्रसाद नामक एक दूसरा किसान था | उसके पास खेत नहीं थे | वह भैरोमल के ही कुछ खेत लेकर खेती करता था ; किन्तु वह था बहुत परिश्रमी | अपने मजदूरों के साथ वह खेत पर जाता था , डटकर परिश्रम करता था | उसके खेत भले प्रकार से जोते और सींचे जाते थे | अच्छी खाद पड़ती थी | घास निकाली जाती थी और बीज भी समय पर बोये जाते थे | उसके घर के लोग भी खेत पर काम करते थे | उसके खेत में उपज अच्छी होती थी | लगान देकर और खर्च करके भी वह बहुत-सा अन्न बचा लेता था | और इस तरह अपनी मेहनत और सूझ-बुझ से थोड़े ही दिनों में राम प्रसाद धनी हो गया |




कुछ दिनों बाद जब भैरोमल बहुत गरीब हो गया , उसके ऊपर महाजनों का ऋण हो गया तो उसे अपने खेत बेचने की आवश्यकता जान पड़ी | यह समाचार पाकर रामप्रसाद उसके पास आया और बोला - मैंने सुना है कि आप अपने खेत बेचना चाहते  है | कृपा करके आप मेरे हाथ अपने खेत बेचें | मैं दूसरों से कम मूल्य नहीं दूंगा |

भैरोमल ने आश्चर्य से पूछा- "भाई रामप्रसाद मेरे पास इतने खेत थे , फिर भी मैं ॠणी हो गया हूँ , किन्तु तुम्हारे पास इतना धन कहाँ से आ गया है ?" तुम तो मेरे ही थोड़े-से खेत लेकर खेती करते हो | उन खेतों की लगान भी तुम्हें देनी पड़ती है और घर का भी काम चलाना पड़ता है | मेरे खेत खरीदने के लिए तुम्हें रूपये किसने दिए ?

राम प्रसाद ने कहा - "मुझे रूपये किसी ने नहीं दिया | रूपये तो मैंने खेतों की उपज से ही बचकर इकठ्ठे किये है | आपकी खेती और मेरी खेती में एक अंतर है | आप नौकरों-मजदूरों आदि सबसे काम करने के लिए "जाओ-जाओ कहते है , इससे आपकी संपत्ति भी चली गयी | मैं अपने मजदूरों और नौकरों से पहले काम करने को तैयार होकर उन्हें अपने साथ काम करने के लिए सदा आओ-आओ कहकर बुलाता हूँ | इससे मरे यहाँ संपत्ति आती है |

अब भैरोमल राम प्रसाद की बात समझ गया था | उसने थोड़े-से खेत रामप्रसाद के हाथ बेचकर अपना ऋण चूका दिया और बाकी खेतों में परिश्रमपूर्वक खेती करने लगा | थोड़े ही दिनों में उसकी दशा सुधर गयी | वह फिर सुखी और संपन्न हो गया |


Moral - दूसरों के ऊपर हमारी निर्भरता हमें कभी भी सफलता नहीं दिला सकती बल्कि इसके लिए तो हमें स्वयं ही परिश्रम करना पड़ेगा |




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दो टट्टू (Hindi Story)



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!! दो टट्टू  !! 





एक व्यापारी के पास दो टट्टू थे | वह उनपर सामान लादकर पहाड़ों पर बसे गाँव ले जाकर बेचा करता था | एक बार उनमें से एक टट्टू कुछ बीमार हो गया | व्यापारी को पता नहीं था कि उसका एक टट्टू बीमार है | उसे गाँव में बेचने के लिए नमक , गुड़ , दाल चावल आदि ले जाना था | उसने दोनों टट्टुओं पर बराबर-बराबर सामन लाद दिया और चल पड़ा |




ऊँचे-नीचे पहाड़ी रास्ते पर चलने में बीमार टट्टू को बहुत कष्ट होने लगा | उसने दुसरे टट्टू से कहा -- "आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है | मैं अपनी पीठ पर रखा एक बोरा गिरा देता हूँ , तुम यहीं खड़े रहो | हमारा मालिक वह बोरा तुम्हारे ऊपर रख देगा | तो इससे मेरा भार कुछ कम हो जाएगा तो मैं तुम्हारे साथ आसानी से चल सकूँगा  | अगर  तुम आगे चले जाओगे तो गिरा हुआ  बोरा फिर मेरी पीठ पर रख दिया जाएगा |




तो इस पर उस दूसरे टट्टू ने कहा - "मैं तुम्हारा भार ढोने के लिए क्यों खड़ा रहूँ ? मेरी पीठ पर क्या कम भार है ? मैं तो सिर्फ अपने हिस्से का ही भार ढोऊंगा |

दुसरे टट्टू की बातें सुनकर बीमार टट्टू चुप हो गया | लेकिन उसकी तबियत अधिक ख़राब हो रही थी | रास्ते में चलते समय एक पत्थर के टुकड़े से ठोकर खाकर वह गिर पड़ा और गड्ढे में लुढ़कता चला गया और वहीँ मर गया |

व्यापारी अपने एक टट्टू के मर जाने से बहुत दुखी हुआ | वह थोड़ी देर वहाँ खड़ा रहा | फिर उसने उस टट्टू के बचे हुए बोरे भी दुसरे टट्टू की पीठ पर लाद दिए | अब तो वह टट्टू पछताने लगा और मन-ही-मन कहने लगा - "यदि मैं अपने साथी का कहना मानकर उसका एक बोरा ले लेता तो यह सब भार मुझे नहीं ढोना पड़ता |


Moral :- संकट में पड़े अपने साथी की जो सहायता नहीं करते उन्हें बाद में पछताना ही पड़ता है | इसलिए , दोस्तों हमें हमेशा संकट में मुसीबत में अपने दोस्तों की सहायता करने का प्रयास करना चाहिए |





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